
लेकिन कुर्बानी के नाम पर कुछ मुसलमानों को लूटा जा रहा है।
ईदुल अज़्हा के मौके पर मुस्लिम बस्तियों, मस्जिदों के बाहर और सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टर बड़ी तेजी से दिखाई देने लगते हैं:
- 1500 रुपये में हिस्सा
- 1800 रुपये में कुर्बानी
- 2100 रुपये में बड़े का हिस्सा
- कुर्बानी शहर से बाहर होगी
- गोश्त नहीं मिलेगा
और फिर नीचे लिखा होता है:
“जिसे गोश्त चाहिए, वह 3500 वाला हिस्सा ले।”
सोचिए…
क्या अब इबादत भी “पैकेज” में बिकेगी?
जिस कुर्बानी का मकसद अल्लाह की रज़ा हासिल करना था,
उसे कुछ लोगों ने कमाई, कारोबार और लोगों की भावनाओं से खेलने का ज़रिया बना लिया है।
आज एक बड़े जानवर की कीमत 30–40 हजार रुपये से कम नहीं है।
गोश्त 360 रुपये किलो बिक रहा है।
तो आखिर 1500–1800 रुपये में कैसी कुर्बानी हो रही है?
सच तो यह है कि कुछ चालाक लोग दीन का लिबास पहनकर भोले-भाले मुसलमानों को बेवकूफ बना रहे हैं।
न जानवर दिखाया जाता है,
न वजन बताया जाता है,
न हिस्सेदारों की जानकारी दी जाती है,
न कोई साफ हिसाब होता है।
बस लोगों से पैसे जमा करो और “अल्लाह के नाम” पर उनकी सादगी और भरोसे को लूट लो।
याद रखो —
जिस पैसे में झूठ हो,
जिस कुर्बानी में फरेब हो,
जिस अमानत में दगाबाज़ी हो,
वह अल्लाह की बारगाह में कबूल नहीं होती।
कुर्बानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ؑ की सुन्नत है,
कोई ऑनलाइन ऑफर या सस्ता धंधा नहीं।
ऐ कौम के लोगों, जागो!
अपने पैसों से ज्यादा अपनी इबादत की फिक्र करो।
कहीं ऐसा न हो कि हम सस्ती कुर्बानी के चक्कर में अपनी आख़िरत महंगी कर बैठें।
खुद भी बचो और अपने आसपास के भोले-भाले मुसलमानों को भी दीन के इन व्यापारियों से बचाओ।
सुन्नत के मुताबिक और अपने देश भारत के कानून का पालन करते हुए कुर्बानी करो।
पुलिस और प्रशासन का सहयोग करो।
कोई नई परंपरा मत डालो और अपने दूसरे भाइयों की आस्था का भी ख्याल रखो।
आओ, हम सब मिलकर एक सच्चे और अच्छे भारत का निर्माण करें।
जात, बिरादरी, रंग, नस्ल और धर्म की राजनीति करने वालों को मुँहतोड़ जवाब दें।
देश में अमन और भाईचारा कायम करें और भीड़तंत्र का शिकार हरगिज़ न हों।
लेखक, डॉक्टर इफ्तेखार अहमद प्रदेश अध्यक्ष कुरेश कॉन्फ्रेंस रजिस्टर्ड उत्तर प्रदेश